ये है मेरी कहानी पूरी नहीं पर आधी है , सुनानी , बचपन में जब रोती थी तब , पापके साथ होती थी तो केहती थी , की मम्मी चाहिए अब । और जब मम्मी का हाथ थामा होता तो , रोती और कहती कि पापा को ढूंढो सब । थोड़े बड़े होने पे पता चला कि , ज़रूर होत्ती है , जब .... तब....वोह दोनों हितो साथ होते है , वरना इतनी चेन कि नींद हम कहा सोते है। दोस्त थे मेरे कई सारे , बस दौड़े आते थे मेरी आवाज़ के मारे । खेलते खेलते कितनी जल्दी रात हो जाती , इसके बीच हमारी कई सारी मीठी बात हो जाती । माँ कि आवाज़ पे पता चलता कि , अब घर जाना हैं । बाद में सब बिखर जाते ये सोचके की , कल फिरसे आना है। बस ऐसे ही वक्त बीतता गया , और अपने साथ बचपन को सींचता गया । बड़े होने की अब बारी आई तो बात ये मुझे सबने समजाई , ...